घटते भू जल स्तर और अकाल की आहट से किसान परेशान
जुलाई माह की वर्षा भी पाताल में नही ला सकी नमी
मानसून के रूठने से कैमूर में अकाल पड़ने का खतरा मंडरा रहा है।खेतो में डाले गए बिचड़े अब जानवरों के चारा के रूप में काम कर रहे है। बारिश नहीं होने से जल का स्तर भी नीचे खिसकता जा रहा है। नहरे भी सुखी पड़ी है।नहरों में पर्याप्त पानी नही मिलने से किसानों के चेहरों पर चिंता की लकीरें स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे है।कृषि विभाग का अभी तक बिचड़ा रोपनी का अकड़ा मात्र चार प्रतिशत ही है। आसमान छूती डीजल की कीमत किसानों के धान के बिचड़े की रोपाई में आड़े आ रही है।किसानों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या बिचड़ा बचाने की है।अब तक जिन खेतो को हरा भरा दिखाई देना था वहा धूल उड़ रही है। कैमूर धान का कटोरा कहा जाता है। मोकरी में पैदा होने वाला चावल भारत ही नहीं विदेशों में भी अपना पहचान बना चुका है। दोहरी मार झेलने को विवश किसानों की आस आसमान पर टिकी है।बीते दो जुलाई के बाद अभी तक वर्षा हुई ही नहीं है। अगर वर्षा का आंकड़ा भी देखा जाए तो अधौरा में 42.2भभुआ में 28.2 भगवानपुर में 6.2,चैनपुर में 53.6चांद में 28.4, दुर्गावती में 26.4 कू दरा में 62.6, मोहनिया में 28.2 नुवाओं में 65.6 रामगढ़ 40.2 रामपुर 20.6 प्रतिशत ही वर्षा हो पाई जो जल स्तर बढ़ाने में नाकाम साबित हुआ।विश्व सूत्रों की माने तो कैमूर की नहरों में पानी की उपलब्धता 750 क्यूसेक की होनी चाहिए।आपूर्ति अभी तक 350क्यूसेक ही की जा सकी है।जो ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। उधर कृषि विभाग द्वारा जिले में 1.10 लाख हेक्टेयर भूमि में धान की खेती का लक्ष्य रखा गया है। शत प्रतिशत धान के बिचड़ा पड़ने वाले इस जिले में अभी तक मात्र 4प्रतिशत ही रोपाई चिंता का सबब बना हुआ है। मानसून की बारिश ठिठकने से किसान सिंचाई के संसाधन से काम चला रहे है।सरकारी नल कूप जो बंद पड़े है उसको चालू कराने में विभाग अपनी सक्रियता नही दिखा रहा है,जबकि कृषि टास्क की बैठकों में जिलाधिकारी कई बार संबंधित विभागों को निर्देशित कर चुके है।लेकिन विभागो में बैठे अधिकारी और बाबू सरकार का तेल फूंकने में लगे हुए है।
मौसम विभाग के अनुसार एक से दो दिनों में वर्षा होने की उम्मीद है।आकाश में बादल छाए हुए है।