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अंतर्जातीय शादी करने पर 50% नौकरी में आरक्षण

देश में 1931के बाद जातीय जनगणना क्यों नहीं
फतुहा। अंग्रेज सरकार द्वारा भारत में पहली बार जातीय जनगणना 1931में कराई गई थी। अंग्रेज सरकार ने 1941 में द्वारा करवाना चाहा परंतु बताया जाता है कि राम मनोहर लोहिया, भीमराव अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल आदि ने कड़ा विरोध किया तथा कहा कि देश को जातिगत आग के ज्वाला में मत झोकें आज राममनोहर लोहिया के चेला जातिगत जनगणना कराने के लिए बेचैन नजर आते हैं।
पटना उच्च न्यायालय द्वारा बिहार सरकार द्वारा कराये जा रहे जातिगत सर्वेक्षण या जनगणना पर तुरन्त रोक लगा देने से यह स्पष्ट हो गया है कि भारतीय संघ की विभिन्न राज्य सरकारें अपने-अपने प्रदेशों की जनता की जनगणना नहीं करा सकती हैं क्योंकि भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्रवधान नहीं है। राज्य सरकार के पटना हाईकोर्ट से जाति आधारित गणना पर जनसुनवाई की गुहार लगाई गई है राज सरकार की अपील पर हाईकोर्ट ने 9 मई को सुनवाई होगी। महाधिवक्ता का कहना था कि कोर्ट ने इस केस में अंतरिम आदेश जारी किया है और अंतिम सुनवाई के लिए अगली तारीख 3 जुलाई तय की है लेकिन न्याय हित में इस मामले को जल्द सुनवाई की जानी चाहिए कोर्ट ने उनके अनुरोध को मंजूर करते हुए सरकार की ओर से जल्द सुनवाई करने के लिए दायर याचिका पर 9 मई को सुनवाई करने का आदेश दिया है। पूरे देश की जनगणना 1948 के कानून के अनुसार भारत सरकार द्वारा ही अखिल भारतीय स्तर पर कराई जा सकती है। भारत का कोई भी कानून किसी राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं देता है कि वह प्रादेशिक आधार पर यह काम करा सके। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद यह मांग बड़ी तेजी से उठती रही है कि देश में जातिगत जनगणना कराई जानी चाहिए। इसके पक्ष व विपक्ष में अलग- अलग तर्क हो सकते हैं मगर इतना निश्चित है कि प्रत्यक्ष रूप से यह कार्य केवल केन्द्र सरकार द्वारा ही कराया जा सकता है। भारत के संविधान में जब आजादी के बाद अनुसूचित जातियों व जन जातियों को आरक्षण दिया गया था तो सरकार के सामने 1931 में अंग्रेज सरकार द्वारा की गई जातिगत जनगणना के आंकड़ें थे मगर 1990 में जब सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया तो इस वर्ग के लोगों के कोई अधिकारिक आंकड़े नहीं थे।
मंडल आयोग ने अनुमान के आधार पर इस वर्ग के लोगों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की थी और राय जाहिर की थी भारत में पिछड़े समुदाय के लोगों की सैकड़ों जातियां हैं जो हिन्दू व मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदायों के लोगों के बीच में मौजूद हैं। इसमें भी अलग-अलग राज्य में अलग-अलग पिछड़ी जातियां हैं। यही वजह कि जिस जाति के लोग बिहार में पिछड़े समुदाय में आते हैं, उत्तर प्रदेश या प. बंगाल में वे उस वर्ग में नहीं आते। परन्तु यह कार्य राज्य अपनी मनमर्जी से नहीं कर सकते इसके लिए केन्द्र स्तर पर पिछड़ा आयोग है। परंतु सवाल यह है कि पटना उच्च न्यायालय ने बिहार के नीतीश सरकार के जातिगत जनगणना सर्वेक्षण का काम पूर्णतः गैरकानूनी माना है और कहां है कि सर्वेक्षण के नाम पर जनगणना कराने का काम नहीं किया जा सकता है। परंतु भारत में यह मुद्दा विशुद्ध रूप से राजनीति का विषय बन चुका है और इसका ही देश सामाजिक न्याय से जोड़ लिया गया है।
राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि देश हित में जाति प्रथा समाप्त
करना होगा। डॉ लक्ष्मी नारायण जी पटेल ने कहा है कि देश में जाति समाप्त करने कि जरुरत है। इसके लिए नौकरी में अंतरजातीय शादी करने वालों को 50% आरक्षण कर देना चाहिए तथा शर्त होनी चाहिए कि अपने से कमजोर वर्ग से कमजोर वर्ग से ही शादी करना होगा, ऐसे स्थिति पैदा कर जाती प्रथा तोड़ी जा सकती है‌।

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