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रानी दुर्गावती के मदनमहल किले का हुआ यह हाल, पढ़ें क्‍या है कारण

जबलपुर। प्रकृति प्रेमियों के लिए जितना अहम भेड़ाघाट है, पुरा-संपदा से जुड़े विषयों में रूचि रखने वालों के लिए उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मदनमहल का किला है। गोंड़वाना कालीन यह किला एक बड़ी चट्टान पर निर्मित है। जिस चट्टान पर यह किला बनाया गया है, उस चट्टान में भी क्षरण होने लगा है। इसके अलावा किले की छत भी कमजोर हो गई है। इसे लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भी चिंता जताई है। उसकी ओर से किले को संरक्षित करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं।

काले पत्थर की एक बड़ी शिला पर यह किला स्थापित है

गोंडवाना साम्राज्य की धरोहर मदन महल का किला पुरातत्व विभाग के लिए भी खास है। इसे अपनी स्थापत्य कला के लिए भी याद किया जाता है। काले पत्थर की एक बड़ी शिला पर यह किला स्थापित है। इस किले का स्ट्रक्चर नीचे से खोखला हो रहा है। किले के सामने वाले हिस्से में नींव की ओर चट्टान के बीच का गैप लगातार बढ़ रहा है। छत में भी दरारें आने लगी हैं। इसके अलावा पिछले हिस्से में किले के बेस की चट्टान से नीचे आकर बहने वाले बरसाती पानी ने नींव वाले हिस्से को खोखला कर दिया है।

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने संभाला मोर्चा

मदनमहल का किला पुरातत्व विभाग के आधीन है, इसलिए वहां किसी भी प्रकार का कार्य करने में जिला या निगम प्रशासन सक्षम नहीं है। इसलिए पुरातत्व विभाग द्वारा पुरा-दृष्टिकोंण से किले के संरक्षण का प्रयास शुरू कर दिया गया है। किले के बेस में चट्टान से लग कर तो सीमेंट-कांक्रीट से ही क्षरण को भरने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन चट्टान के ऊपर स्थित किले की दीवारों और छत को विशेष प्रकार के पेस्ट से और खास तकनीक से सुरक्षित किया जा रहा है। किले के अलावा विभाग द्वारा किले के 100 मीटर की परिधि में आने-जाने के मार्गों को दुरुस्त करने और वहां की पुरा संरचनाओं को व्यवस्थित करने का प्रयास किया जा रहा है।

प्राकृतिक तरीक से संरक्षण

जिन चीजों का उपयोग इस किले के निर्माण के समय किया गया था, उन्हीं चीजों से पुरातत्व विभाग किले का सुधार कार्य करवा रहा है। जिम्मेदारों का कहना है कि सुधार कार्य के लिए तैयार किए जाने वाले पेस्ट में गुड़, बेल, उड़द की दाल, चूना और कुछ खास पौधों की जड़ों का उपयोग किया जा रहा है।

मदनमहल किले का बेस कमजोर हो गया है। उसे दुरुस्त कराया जा रहा है। किले की छत में भी दरारें आ चुकी हैं। उसे भी पहले के समय में जुड़ाई के लिए उपयोग किए जाने वाले यौगिक से भरने का प्रयास चल रहा है। एएसआइ मदनमहल किले के सौ मीटर परिधि में व्यवस्थाएं बेहतर करने की दिशा में काम कर रही है।

डा. शिवाकांत बाजपेई, अधीक्षक, जबलपुर रीजन-एएसआइ

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