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जो बोल-सुन नहीं सकते अब सीख रहे हैं इशारों की भाषा

ग्वालियर। जो बोल-सुन नहीं पाते हैं अब वो भी संवाद कर सकेगे, अब वो इशारों की भाषा में बात करेंगे। इशारों की भाषा यानि सांकेतिक भाषा या साइन लैंग्वेज, एक एेसी भाषा जो किसी ऐसे व्यक्ति जो बोल या सुन नहीं सकता है उसके साथ संवाद के समय काम आती है। हाथों के मूव और चेहरे के हाव भाव से मिल जुल कर तैयार हुई साइन लैंग्वेज अब शहर में ऐसे विशेष बच्चों को सिखाई जा रही है जो बोल सुन नहीं पाते हैं। शहर के स्मार्ट सिटी आफिस में एक एनजीओ च्दिव्य दृष्टि एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटीज् के द्वारा एक स्कूल चलाया जा रहा है, जो पिछले 8 साल से ऐसे विशेष बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रहा है जो कहीं न कहीं सुनने, बोलने या देखने में सक्षम नहीं है। इस स्कूल के विशेष शिक्षक अंकुश गुप्ता से बात कर नईदुनिया ने जाना कि साइन लैंग्वेज के माध्यम से छात्रों को शिक्षा देना किस प्रकार का अनुभव देने वाला होता है , साथ ही किन किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

66 बच्चों को पढ़ाते हैं 5 शिक्षक

यह स्कूल कक्षा 12वीं तक संचालित होता है। यहां यूपी, एमपी और राजस्थान के कुल 66 विशेष छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इसमें विशेष बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा 5 विशेष शिक्षकों का है। यह शिक्षक पिछले कई वर्षों से इन विशेष छात्रों को न सिर्फ पढ़ा रहे हैं बल्कि उन्हें सफलता के साथ शिक्षित भी कर रहे हैं। हाथों और फेस के एक्सप्रेशन की सहायता से पहले बच्चों काे समझाने का प्रयास किया जाता है और फिर जब वह एक बार साइन लैंग्वेज से परिचित हो जाते है तब इसी साइन लैंग्वेज की सहायता से उन्हें संबंधित कक्षा के लिए शिक्षित किया जाता है।

समावेशी शिक्षा विशेष ध्यान

स्मार्ट सिटी में चल रही इन विशेष कक्षाओ में समावेशी शिक्षा के आधार पर छात्रों को शिक्षित किया जाता है। जिसमें इन विशेष छात्रों को सामान्य छात्रों के बीच में बिठा कर ही पढ़ाया जाता है। इसके उद्देश्य की बात करें तो इस शिक्षा प्रणाली से विशेष बच्चों के माहौल में बदलाव होगा साथ ही सामान्य बच्चों के मन में दिव्यांग बच्चों के लिए किसी भी प्रकार की हीन भावना नहीं पनपेगी। पुलिस भी सीख रही साइन लैंग्वेज: पुलिस थानों में भी कई बार मूक बधिर पीडित आते हैं। जिसने संवाद करने में पुलिसकर्मियों को काफी समस्या का सामना करना पड़ता है। संवाद में समस्या आती है तो फिर पुलिस को किसी न किसी साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट को बुलाना पड़ता है। असल समस्या ताे तब होती है जब साइन लैंग्वेज का विशेषज्ञ नहीं मिलता और पुलिस पीडित की समस्या को नहीं समझ पाती है। इसका निराकरण करने के लिए पुलिस ने हाल ही में नई मुहीम शुरू की है जिसमें पुलिस खुद यह विशेष साइन लैंग्वेज सीख कर इस प्रकार के पीडितों से संवाद कर सकेगी।

शहर में आज भी सांकेतिक भाषा को लेकर जागरूकता नहीं है। जिससे मूक बधिर बच्चों का भविष्य खतरे में आ रहा है। शासन-प्रशासन को इस क्षेत्र में आगे आ कर सहायता करना चाहिए । साथ ही ऐसे बच्चों के परिजनाें को भी विशेष काउंसलिंग की आवश्यकता है।

अंकुश गुप्ता, सांकेतिक भाषा विशेषज्ञ एवं विशेष शिक्षक

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