कटिहार में वट सावित्री पूजन धूमधाम से मनाया
कटिहार। जिले के विभिन्न भागों में वट सावित्री पूजन उत्सव धूमधाम से मनाया गया। शहर के तीनगछिया, नया टोला, बड़ा बाजार, मंगल बाजार, गामी टोला, अमला टोला, मिर्चाईबारी, हृदयगंज आदि क्षेत्र में महिलाओं ने पति की रक्षा के लिए वट सावित्री पूजन हर्षोल्लास एवं विधि विधान के साथ किया गया। कटिहार जिले के मनिहारी, अमदाबाद, मनसाही, प्राणपुर, कदवा, आजमनगर, बारसोई, बलरामपुर,हसनगंज,डंडखोरा, गेराबाड़ी,बरारी,फलका, कुरसेला प्रखंड में भी विवाहित महिलाओं ने पति की रक्षा के लिए वटवृक्ष की पूजा अर्चना किया। प्रखंड क्षेत्र के सभी पंचायतों में वट वृक्ष सावित्री पूजा की गई। हिंदू परंपरा में स्त्रियां अपने पति के दीर्घायु लंबी उम्र के लिए और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए तमाम व्रत का पालन करती है।व्रति नीलम देवी,स्नेहा रानी,शकुन्तला देवी,आशा देवी,अंजली देवी ने कहा कि वट सावित्री पर्व सौभाग्य प्राप्ति के लिए एक बड़ा पर्व माना जाता है। यह जेठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या को किया जाता है। इसके साथ सत्यवान सावित्री की कथा जुड़ी हुई है। जिसमें सावित्री ने अपने संकल्प से और अपनी श्रद्धा से यमराज से सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। महिलाएं संकल्प के साथ अपने पति की आयु और प्राण रक्षार्थ के लिए इस व्रत को करने की संकल्प लेती है इस व्रत को करने से सुखद और संपन्न और दांपत्य जीवन का वरदान मिलता है। वट सावित्री का व्रत संपूर्ण परिवार को एक सूत्र में बंधे रखता है वट वृक्ष बरगद एक देव वृक्ष माना जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सावित्री भी वटवृक्ष में हीं रहते हैं। प्रलय के अंत में भगवान कृष्ण भी इसी वृक्ष के पत्ते पर प्रकट हुए थे। तुलसीदास ने वट वृक्ष को तीर्थ राज का छत्र कहा है। यह वृक्ष ना केवल अत्यंत पवित्र है बल्कि काफी ज्यादा दीर्घायु भी है। लंबी आयु और शक्ति धार्मिक महत्व को ध्यान में रखकर इस वृक्ष की पूजा की जाती है और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए भी इस वृक्ष को ज्यादा महत्व दिया गया है। सुबह- सुबह स्नान करके निर्जल रहकर इस पूजा का संकल्प लेकर वट वृक्ष के नीचे सावित्री सत्यवान और यमराज की मूर्ति स्थापित की जाती है एवं मानसिक रूप से भी इसकी पूजा की जाती है। वटवृक्ष के जड़ में जल डालकर फल फूल और मिठाई से पूजा की जाती है। कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष की परिक्रमा की जाती है। सुत तने में लपेटी जाती है कम से कम सात फेरे लगाई जाती है हाथ में भीगा चना लेकर सावित्री सत्यवान की कथा सुनी जाती है । फिर भीगा चना कुछ धन और वस्त्र अपनी सासू मां को लेकर उनका आशीर्वाद ली जाती है वट वृक्ष का को फल खाकर उपवास समाप्त की जाते हैं या नींबू पानी पीकर उपवास समाप्त की जाती है।