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कहा- विभाग अपनी जवाबदेही को शटलकॉक की तरह शिफ्ट कर रहे हैं, नमामि गंगा के खर्च का ब्यौरा मांगा

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करोड़ों लोगों की आस्था गंगा की दुर्दशा पर कड़ा रुख अपनाया है। नमामि गंगे योजना के तहत खर्च किए गए रुपयों का हिसाब मांगा है।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा प्रदूषण के मामले में बुधवार को तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने सुनवाई करते हुए जल निगम, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि विभाग अपनी जवाबदेही को शटलकॉक की तरह शिफ्ट कर रहे हैं। कोर्ट ने नमामि गंगे के तहत गंगा प्रदूषण खत्म करने पर किए गए खर्च का ब्यौरा भी मांगा है।विशेषज्ञ नहीं तो फिर कैसे निगरानी हो रही?कोर्ट को बताया गया कि जल निगम के पास पर्यावरण विशेषज्ञ नहीं हैं। इसपर कोर्ट ने पूछा तो फिर वह पर्यावरण की निगरानी कैसे कर रहा है? सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलाने की जिम्मेदारी प्राइवेट कंपनी को सौंप दी और खुद अक्षम अधिकारी से निगरानी कर रहा है। कोर्ट ने महानिदेशक नेशनल मिशन क्लीन गंगा से उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी है।नमामि गंगे परियोजना में कितना रुपया खर्च हुआकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए यह भी पूछा है कि नमामि गंगे परियोजना के तहत अब तक कितना पैसा खर्च किया है। कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जांच रिपोर्ट मांगी है। बोर्ड ने एसटीपी की जांच के लिए 28 टीमें गठित की है। कोर्ट ने यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से टेस्टिंग, शिकायत निस्तारण न अधिकारियों के खिलाफ अभियोग चलाने की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही पूछा कि गंगा जिन शहरों से होकर गुजरी हैं, वहां पर बने नालों को एसटीपी से जोड़ा गया या नहीं। नालों की स्थिति, डिस्चार्ज, ट्रीटमेंट व जल की गुणवत्ता को लेकर जानकारी मांगी है। एएसजीआई ने कोर्ट से विस्तृत जानकारी पेश करने के लिए समय मांगा। याचिका की सुनवाई 26 सितंबर को होगी। चीफ जस्टिस राजेश बिंदल, जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस अजीत कुमार की पूर्णपीठ ने गंगा प्रदूषण के मामले में दाखिल जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।हकीकत में विभागों के काम आंखों में धूल झोंकने वालेसुनवाई के दौरान कोर्ट ने विभागों में आपसी तालमेल की कमी पर गहरी नाराजगी जताई। कहा कि मामले में विभाग अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का सही से जवाब देने की बजाय शॅटल कॉक की तरह एक-दूसरे के पाले में डाल रहे हैं। जबकि, हकीकत में विभागों के कार्य आंखों में धूल झोंकने वाले हैं। कोर्ट ने उन शहरों के साइट प्लॉन को भी देखा जहां से गंगा गुजरी हैं।गंगा में गिर रहे 15 शहरों के 74 नालेकोर्ट को न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण कुमार गुप्ता ने बताया कि यूपी में गंगा 15 शहरों से गुजरती हैं। उसके लिए साइट प्लान की रिपोर्ट प्रमुख सचिव नमामि गंगे की ओर से दाखिल किया गया है। इन शहरों में 74 नाले हैं, जो गंगा में गिर रहे हैं। इस पर कोर्ट ने अपर महाधिवक्ता नीरज तिवारी से पूछा कि इन शहरों की एसटीपी से शहरों के नालों को जोड़ा गया है या नहीं। इस पर न्यायमित्र गुप्ता ने कहा कि प्रयागराज सहित अन्य जिलों में तकरीबन 58 से 60 फीसदी कनेक्ट किया गया है। तीन जिलों में बलिया, प्रतापगढ़ सहित तीन जिलों में एसटीपी नहीं बनी हैं।प्रयागराज में पानी के 7 स्थानों के नमूने फेलकोर्ट ने प्रयागराज में होने वाले कुंभ, माघ मेला के दौरान गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था जानी तो बताया गया कि मोबाइल एसटीपी के जरिए जल का शुद्धिकरण किया जाता है। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। याची अधिवक्ता वीसी श्रीवास्तव व शैलेश सिंह ने बताया कि उन्होंने प्रयागराज के सात स्थानों से जल की जांच कराई है लेकिन सभी जांच फेल हो गए हैं। पानी सही नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी एसटीपी को बंद कर देना चाहिए। कोर्ट ने प्रयागराज नगर निगम के अधिवक्ता से एसटीपी से हो रहे शोधन की रिपोर्ट के बारे में पूछा। उन्होंने मामले में हलफनामे पर जवाब दाखिल करने को कहा है।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरफ से अधिवक्ता बाल मुकुंद सिंह, भारत सरकार जलशक्ति मंत्रालय की तरफ से एक एसजीआई शशि प्रकाश सिंह व राजेश त्रिपाठी, नगर निगम प्रयागराज के अधिवक्ता एसडी कौटिल्य ने पक्ष रखा।कोर्ट की नाराजगी के प्रमुख बिंदुअभी तक कानपुर की टेनरियां शिफ्ट नहीं हुईं।इतने पैसे खर्च करने के बावजूद गंगा की स्थिति जस की तस है।सीवेज ट्रीटमेंट प्लॉट (एसटीपी) की मॉनिटरिंग भी सहीं तरीके से नहीं हो पा रही है।निगमों के पास कोई पर्यावरण इंजीनियर नहीं है।नेशनल गंगा मिशन, जल निगम, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित अन्य विभागों की ओर से आदेश के बावजूद मामले में जवाब दाखिल न करना।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एसटीपी से लिए गए 29 नमूनों की रिपोर्ट मांगी तो बताया गया कि अभी जांच रिपोर्ट नहीं आई है।विभाग जवाबदेही नहीं समझ रहे, अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर टाल रहे हैं।

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