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बिहार में एक भी आधुनिक ट्रामा सेंटर नहीं, घायलों के इलाज में परेशानी

फतुहा। बिहार में एक भी एडवांस ट्रामा सेंटर नहीं है। अगर किसी दिन राज्य में कोई बड़ी सड़क दुर्घटना हो जाए तो मरीजों को उपचार सामान्य अस्पतालों में ही होगा। नियमानुसार एच एन पर 50 किलोमीटर के भीतर ट्रामा सेंटर होना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के 46 अस्पतालों को ट्रामा सेंटर के रूप में अधिसूचित कर दिया है, हर एक जिला (दरभंगा -, बेतिया) को छोड़कर सदर अस्पताल ट्रामा सेंटर के रूप में अधिसूचित है, लेवल -2 के स्तर के 10 ट्रामा सेंटर अधिसूचित है जिसमें पटना के पीएमसीएच,एन एम सी एच वह एम्स, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, गया, भागलपुर, नालंदा ,बेतिया, मधेपुरा मेडिकल कॉलेज है। लेकिन अस्पताल महज कागजों में ट्रामा सेंटर के रूप में काम कर रहे है।(बताया जाता है कि पटना में लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल जा राजबंशी नगर मे दो ड्रामा सेंटर है।) बिहार में उन्नत किस्म के ट्रामा सेंटर नहीं होने से दुर्घटना के बाद परिजन समझ नहीं पाते हैं कि मरीज को कहां भर्ती कराएं क्योंकि अगर दुर्घटना में पेट इंज्यूरी,चेस्ट इंज्यूरी,हेड इंज्यूरी, स्पाइनल इंज्यूरी हो जाए तो एक छत के नीचे राज्य में किसी भी अस्पताल में इसका इलाज नहीं हो सकेगा ,दुर्घटना में सिर में चोट के साथ बर्न(जलने) का मामला आ जाए तो किसी भी अस्पताल में इसके लिए सुविधा नहीं है। एक तरह से दुर्घटना में हड्डी टूटने का ही इलाज हो पाता है। बाकी बीमारियों के उपचार के लिए मरीज को दूसरे डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। लेबल एक में 500 बेड रहना जरूरी है। इसमें 10 बेड,आईसीयू और 20 ट्रामा इमरजेंसी का होना चाहिए। एम आर आई सीटी स्कैन सहित अन्य सुविधाएं 24 घंटे हो। सभी तरह के सुपर स्पेशलिस्ट विभाग और रिसर्च व ट्रेनिंग हो। इस मानक पर बिहार में अभी एक भी अस्पताल नहीं है। लेवल दो में 200 से अधिक बेड रखने हैं। इसमें 20 बेड का ट्रामा सेंटर होना चाहिए। जिसमें दस बेड आईसीयू और 10 बेड ट्रामा इमरजेंसी के लिए सुरक्षित होंगे। हर विभाग के डॉक्टर पर जांच की सुविधा हो। लेवल 3 तीन 100 बेड हो जि भरसमें
ट्रामा के लिए 10 बेड , जिसमें पांच आसीयू पांच बेड एमरजेंसी के लिए हो। यहां जनरल सर्जन स्पेशलिस्ट ,ऑर्थो और मेडिकल अफसर की सुविधा हो।

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