जातीय गणना कराए जाने से निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए नीति एवं कार्यक्रम बनाने में मिलेगी सहायता: उमेश सिंह कुशवाहा
किसी भी कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु अद्यतन आंकड़े होते हैं आवश्यक: उमेश सिंह कुशवाहा
किसी के साथ नही होगा भेदभाव, संपूर्ण समाज का हो सकेगा संतुलित विकास: उमेश सिंह कुशवाहा
पटना
जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश अध्यक्ष श्री उमेश सिंह कुशवाहा ने सोमवार को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी द्वारा विगत 30 वर्षों से जातीय गणना कराए जाने की मांग की जाती रही है। उन्होंने सर्वदलीय सहमति प्राप्त कर इसे प्रदेश में अपने संसाधनों से कराने का निर्णय लिया है। जातीय गणना से सामने आए आंकड़ों द्वारा सभी जातियों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति की वास्तविक जानकारी मिल पाएगी और सरकार को सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए आवश्यकतानुसार विशेष नीति एवं कार्यक्रम बनाने में सहायता मिलेगी। जिससे संपूर्ण समाज का विकास हो सकेगा।
उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि समावेशी विकास का अर्थ ही है कि ऐसे सभी लोग, वर्ग या जातियां जो सरकार के कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाए हैं, उन्हें विकास की मुख्यधारा से प्रभावी रूप से जोड़ना और यह तभी संभव हो पायेगा जब सभी जातियों के सामाजिक व आर्थिक आंकड़े अद्यतन उपलब्ध हों। हाल ही में केंद्र सरकार ने ओबीसी बिल लाकर राज्यों को भी ओबीसी की सूची तैयार करने की जिम्मेवारी दी है। इसके लिए सोशियो- इकनोमिक कास्ट सेंसस और भी अधिक अपरिहार्य हो गया है। जदयू के सर्वमान्य नेता माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार संतुलित, समग्र एवं समेकित विकास सुनिश्चित करने हेतु जातीय जनगणना की मांग करते रहे हैं, ना कि राजनैतिक हितों को साधने के लिए। हमारे नेता नीतीश कुमार का राष्ट्र एवं राज्य के विकास के प्रति सकारात्मक सोच इससे स्पष्ट होता है। साथ ही संतुलित एवं समग्र विकास हेतु उनकी प्रतिबद्वता भी दर्षाता है।
प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि लोहिया जी के समतामूलक समाज की अवधारणा को साकार करने के उद्देश्य से ही बिहार सरकार ने ओबीसी को दो वर्गों में वर्गीकृत किया था, स्ट्रीम बैकवर्ड क्लास एवं बैकवर्ड क्लास। ईबीसी के लिए सरकारी सेवाओं में 18ः और ओबीसी के लिए 12ः आरक्षण का प्रावधान किया गया था। ईबीसी महिलाओं के लिए 3ः सीटें आरक्षित की गई थी।
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी अपना मत व्यक्त किया है कि जाति आधारित आंकड़ों के अभाव के फलस्वरूप् कई समस्याएं हुयी हैं। रोहिणी आयोग, विशेषज्ञ कमेटी एवं विभिन्न संस्थाओं ने जनसंख्या से संबंधित नेशनल डाटा बैंक तैयार करने की आवश्यकता पर लगातार बल दिया है। निश्चित रूप से जातीय गणना का लाभ समाज के सभी वर्ग को प्राप्त होगा और उन्हें प्रशासन, राजनैतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो पाएगा।
उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि जातीय गणना से वैसे राजनीतिक दलों की सच्चाई भी सामने आएगी जो अपना राजनैतिक हित साधने के लिए जाति विशेष को आरक्षण देने की मांग करते रहते हैं। आजादी के बाद 1951 में पहली बार जनगणना कराई गई, परंतु पिछड़े वर्ग की संख्या के आंकड़े प्राप्त नहीं किए गए, तब सरकार का तर्क था कि जातीय गणना कराने से भारतीय समाज बंट जाएगा। फलस्वरूप आजादी के बाद जितनी भी कल्याणकारी योजनाएं बनाई गयीं, वह सभी 1931 के पुराने आंकड़ों पर ही आधारित रही हैं। जबकि किसी भी योजना या कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु अद्यतन आंकड़े आवश्यक होते हैं।